देश के बाहर बेरोजगारी की मार झेल रहे भारतीय, यहां परिवार चुका रहा कीमत

चेन्नई। हालात अकसर लोगों को इतना मजबूर कर देते हैं कि परिवार का पेट पालने के लिए लोग विलायत जा कर पैसा कमाते हैं। लेकिन वहां जा कर क्या होगा वह खुद भी नहीं जानते। ताजा मामला है चेन्नई का, चेन्नई से करीब सौ किमी. दूरी पर स्थित कांचीपुरम जिले के वेंबक्कम गांव है। जहां पर पांच परिवारों में हर एक सदस्य खाड़ी देशों में काम करता है। इसी गांव में एक परिवार पांडीश्वरी का है जिसका पति बालामुर्गन शादी के केवल सात माह बाद ही कुवैत चला गया था।

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काम की खोज में गया बालामुर्गन पिछले एक साल से घर नहीं लौटा है। कुवैत में कच्चे तेल के दामों में तेजी से मंदी के कारण कई भारतीय बेरोजगार हो गए हैं। बालामुर्गन की पत्नी पांडीश्वरी ने बताया कि उसके पति की जब नौकरी चली गई थी तब वह कॉल कम किया करते थे। कोई खबर न होने पर उसके लिए हर रात अपने पति के फ़ोन का इंतजार करना किसी दु:स्वप्न से कम नहीं था। संयुक्त परिवार होने के कारण वह अपने पति से बात भी नहीं कर पाती थी। हालांकि, अब बालामुर्गन को नौकरी मिल गई है। आज वह भाग्यशाली है कि उसकी अपने पति से वीडियो पर बात हो गई।

वह आगे बताती है कि “मैं कई समस्याओं से जूझ रही हूं और मेरे पति भी। इसलिए हम बहुत सीमित बात करते हैं। हम एक दूसरे को दिलासा देने का प्रयास करते हैं। बाद मैं मुझे रोना आ जाता है। इसके अलावा मैं और कर भी क्या सकती हूं।”

लेकिन वहीं दूसरी ओर गांव के एक और परिवार बेहद ही दुखों से गुजर रहा है। कवि श्यामला के पति मुथुवेल राजा की मौत कुछ दिनों पहले ही कुवैत में हो गई। राजा वहां स्थानीय लोगों के संपर्क से काम करने गए थे लेकिन उन्हें कोई नौकरी नहीं मिली। सभी ने उनकी तस्वीरें देखीं जिसमें राजा अस्पताल में कोमा में दिखाई दे रहे थे। बताया गया है कि उनका पार्थव शरीर अभी तक भारत नहीं आया है।

लेकिन राजा के परिवार वाले राजा की मौत को साजिश के तहत मारे जाने की बात कह रहे हैं। श्यामला ने बताया कि “मुझे पूरा भरोसा है कि उन्हें स्थानीय संपर्क के लोगों ने पीट-पीटकर मार डाला है। उन्हें कोई बीमारी नहीं थी। वह कभी भी बीमार नहीं हुए। यहां तक कि उन्हें कभी भी सिर दर्द तक नहीं हुआ।”  राजा के पिता का कहना है कि “सरकार को उसे नौकरी देनी चाहिए ताकि वह अपने तीन बच्चों का भरण-पोषण कर सके। उन्हें इस मामले की सच्चाई का पता लगाना चाहिए।”

प्राप्त जानकारी के अनुसार इन पीड़ित परिवारों की सहायता एक संगठन अरुणोदय माइग्रेंट इनिशिएटिव्स करता है। इस समूह की कोऑर्डिनेटर जे. जयंती ने बताया कि विदेश में रहने वाले पतियों और यहां पर रहने वाली उनकी पत्नियों से हम बात करते हैं। हम इस तरह से काम करते हैं कि पति-पत्नी के बीच बेहतर समझदारी बने।” 

पांडीश्वरी और कवि श्यामला की यह दर्दनाक कहानी वेंबक्कम में इसी तरह की परेशानियों से गुजर रही हजारों महिलाओं की हालात को बयां करती है। जहां उनके पति बाहर बेरोजगारी से लड़ रहे हैं, वही दूसरी ओर यहां भारत में उनके परिजन ज़िंदगी जीने की जद्दोजहद से रुबरू होने पर मजबूर हैं।

 

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