ओलंपिक में गोल्ड जीतने वाले बहुजनों से मिलिए, जिन्हें जातिवाद ने दफ्न कर दिया

नई दिल्ली। ब्राजील के रियो डी जेनेरियो में ओलंपिक खेल चल रहे हैं, लेकिन विश्वगुरू होते हुए भी भारत के हाथ खाली हैं। छठे दिन भी भारतीय खिलाड़ियों को निराशा हाथ लगी। ज्यादातर मेडल चाइना, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और साउथ कोरिया के खाते में जा रहे हैं। भारत से 119 खिलाड़ी रियो के लिए गए हैं लेकिन ज्यादातर खाली हाथ वापसी की राह पर हैं। 

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रियो से खाली हाथ लौटने के बाद सोशल मीडिया पर एक बहस छिड़ गई है। इसमें सवाल उठ रहे हैं कि क्या हमारे पास खिलाड़ियों के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं है। अगर नहीं है तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है। खिलाड़ियों के लिए मिलने वाले सम्मान को लेकर भी एक बहस चल रही है। इस कड़ी में हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद से लेकर अन्य खिलाड़ियों के मुद्दे उठाए जा रहे हैं। ऐसी बहुत सारे खिलाड़ी हैं जो जातिगत भेदभाव के कारण 


निखिल आनंद ने व्यक्तिगत खेल स्पर्धा में पहला पदक जीतने वाले के.डी.जाधव के बारे में लिखा है
महान ओलंपिक खिलाड़ी ‘खाशाबा दादासाहेब जाधव उर्फ के.डी. जाधव’ (जन्म: 15 जनवरी, 1926- मृत्यु: 14 अगस्त, 1984) को शत्- शत् नमन। 1952 हेलसिंकी ओलम्पिक के बैंटमवेट वर्ग कुश्ती में कांस्य जीत कर भारत के लिये ओलम्पिक की व्यक्तिगत खेल स्पर्धा में पहला पदक जीतने वाले के.डी.जाधव को भारत का पद्म सम्मान भी नसीब नहीं होता है, यह कितना बड़ा दुर्भाग्य है। गैर-द्विज शूद्र समाज में जन्मे के.डी. जाधव को हेलसिंकी ओलम्पिक के लिए टीम चयन के दौरान साजिश का सामना करना पड़ा था जिसके बाद काफी मशक्कत से वे अपनी प्रतिभा साबित कर ओलंपिक तक पहुँचे। 

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जाधव की आर्थिक मदद की माँग को तात्कालीन सरकारों ने अनसुना/अनदेखा कर दिया था तब उन्होंने गाँव पर में चंदा करके, अपनी सम्पति- घर गिरवी रखकर ओलम्पिक जाने के लिये धन जुटाया था। वापस आने पर केडी ने अनेकों कुश्ती प्रतियोगिता जीतकर लोगों के कर्ज- पैसे वापस कर ऐहसान चुकाये थे। गरीबी एवं संघर्ष के बावजूद खुद्दारी में जीवन जीते हुये केडीजाधव की मौत 1984 में सड़क दुर्घटना में हो गई। 


आश्चर्य ही नहीं शर्म की बात है कि ओलंपिक पदक के 50वें साल और मृत्यु के 15वें साल में 2001 में जाकर उन्हें अर्जुन सम्मान मिल सका लेकिन वो अकेले ओलंपिक पदक विजेता हैं जिनको कोई पद्म सम्मान नहीं दिया गया। समाज के निचले पायदान से दुनिया में भारत का नाम रौशन करने वाले एक खिलाड़ी की साधारण उपेक्षा का यह मामला नहीं है बल्कि गैर-द्विज मेहनतकश जातियों के लिहाज से गंभीर जातिवादी पक्षपात एवं सामाजिक पूर्वाग्रह का मामला भी दिखता है। ‘ध्यानचंद’ के साथ ‘केडीजाधव’ को भारत रत्न से सम्मानित कर भारत के माथे पर लगे इस पक्षपात और पूर्वाग्रह के कलंक को धोने का काम वर्तमान या भविष्य की कोई भारत सरकार कब करती है इसका इंतजार रहेगा।


जयपाल सिंह मुंडा की तस्वीर शेयर करते हुए वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल ने लिखा है….

पहचानिए कौन?
1928 में भारत के लिए ओलंपिक में हॉकी का गोल्ड मेडल लाने वाली टीम के पहले कप्तान, जिनके नेतृत्व में भारत 17 में से 16 लीग मैच जीता, 1 ड्रॉ रहा, ध्यानचंद इनकी कप्तानी में खेले थे, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में इकोनॉमिक्स के स्कॉलर, हॉकी खेलने के लिए ICS की नौकरी छोड़ी, भारतीय संविधान सभा के सदस्य, आदिवासी महासभा के संस्थापक.

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न भारत रत्न, न पद्म विभूषण, न पद्म भूषण.. कुछ नहीं.
जो देश अपनी नायिकाओं और नायकों का सम्मान करना नहीं जानता, वह नायिकाओं और नायकों के लिए तरसता है.
रियो में खाली झोली का सबक!
बाबाजी पलवंकर बालू
बाबाजी पलवंकर बालू टीम के बाकी खिलाड़ियों के साथ खाना नहीं खा सकते थे। वो टी ब्रेक में चाय साथ नहीं पी सकते थे। यहां तक कि ड्रिंक्स में उन्हें अपने लिए अलग पानी का इंतजाम करना होता था। डिस्पोजेबल क्रॉकरी उनके लिए थी, जिसमें खाने पानी का इंतजाम होता था। उन्हें इस वजह से कप्तान नहीं बनाया गया, क्योंकि वो ब्राह्मण नहीं अछूत थे। उन्हें बल्लेबाजी का मौका इसलिए नहीं मिलता था, क्योंकि वो ब्राह्मण नहीं थे। पूना में पारसी क्लब के लिए उन्हें काम मिला पिच बनाने का। उन्हें महीने के तीन रुपये दिए जाते थे। पिच बनाने के अलावा गेंदबाजी करना भी उनका काम था।

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बल्लेबाजी ‘एलीट क्लास’ के लिए होती थी। गेंदबाजी का मतलब मजदूरी। बालू बाएं हाथ के ऑर्थोडॉक्स स्पिनर थे। वो पूना क्लब चले गए, जो यूरोपियन के लिए था। सेलरी हो गई चार रुपये महीना। यहीं पर उनकी प्रतिभा को पहचाना गया। जेजी ग्रेग उन्हें हर बार आउट किए जाने पर आठ आना देते थे। इसके लिए वो घंटों नेट्स में गेंदबाजी करते थे। उसके बाद बंबई के हिंदू जिमखाना में उन्हें खिलाने की बात हुई। क्लब के ज्यादातर ब्राह्मण सदस्य इसके खिलाफ थे। उन्हें शामिल किया गया। लेकिन खाना-पानी अलग। बंबई में तब चार टीमों का टूर्नामेंट होता था। हिंदू, मुस्लिम, पारसी और ब्रिटिश। बाद में इसमें पांचवीं टीम भी आ गई। क्रिकेट करियर के बाद उनकी बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर से मित्रता हो गई। आंबेडकर ने उन्हें दलितों का हीरो बताया। बालू ने प्रथम श्रेणी के 33 मैच खेले और 179 विकेट लिए, 15 के आसपास की औसत से।  

 

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